The love of lord Krishna and his beloved Radha has always been remarked as the most pure, eternal form of love known to mankind. Here is a poem of mine which highlights certain questions that my mind has encountered during the folds of this night. I know many of you may not agree to my views, do let me know what you feel.

उस घड़ी, जब कृष्ण हज़ारों गोपियों के साथ रास लीला रचा रहे होंगे,
क्या सच में, बस राधा को ही अपने मन में बसा पा रहें होंगे?
ज़रा सोचो,
उस घड़ी, क्या रही होगी राधा की दशा,
जब प्रिय को अपने,
उसने हज़ारों के मन में देखा था बसा|
चूर-चूर हो चुका होगा गुरूर उसका उसी वक़्त,
और शायद अपने प्रेम पर वो प्रश्‍न उठा रही होगी,
बाट कर हृदय के टुकड़े को सबसे,
क्या सच में वो मुस्कुरा रही होगी?
नाम चाहे उसी के साथ जुड़े कृष्ण का,
क्या सच में वो उसे अपना बुला पा रही होगी?
कितनी बेताबी के साथ खोजा होगा
अपने चेहरे को उस कमल जैसे नयन में उसने,
जब उसके कृष्ण के रूप में लीन,
उसकी सखियाँ भी शर्मा रही होंगी|
अपना सब कुछ नाम कर दिया था जिसके उपर उसने,
उसे द्वारिका जाता देख,
वो आँखें ना जाने कितनी यमुना बहा रही होंगी|
क्या ऐसे प्रेम को वो सच में अपना पा रही होगी?
क्या सच में वो कृष्ण की ही राधे कहला रही होगी??

Naina Pandey

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