हवा चल रही है अराजकता की,
पूरा विश्व लगा रहा इल्ज़ाम है,
बड़े असहनशील है यह भारतीय,
सिर्फ लड़ना-झगड़ना ही इनका काम है।
तो आओ, लाँघ ले मज़हब की दीवारें,
सभी मिलकर दे देश की एकता का परचम,
और कह दे सबसे मिलाकर सुर से सुर,
देखो कितने सहनशील हैं हम ।

कैसे हँसते हँसते सह ली थी हमने,
200 वर्षों की काली गुलामी,
कितनी सुगमता से आज़ादी के खातिर,
हमने स्वीकार ली अपनों की कुर्बानी,
अपने ही देश में सहे ढेरों अत्याचार,
अपने ही देश में मिले हजारों सितम,
पर कुछ ना तोड़ सका हमारे धैर्य के बांध को,
देखो कितने सहनशील है हम ।

भले 67 बरस की हो चली है आज़ादी,
पर अभी तक भूखमरी जीवित है,
भ्रष्टाचार के नाशक कीड़ों से,
देश का हर हिस्सा पीड़ित है ।
जो थे कभी हमारे अपने, (पाकिस्तान)
जुदा होकर आज वही दे रहे हैं सितम,
पर हर दर्द को छिपा लेती है हमारी मुस्कुराहट,
देखो कितने सहनशील हैं हम ।

खैर दूसरों से क्या शिकायत करें,
जब देश में ही मौजूद हमारे विनाशक हैं ,
जहाँ पढे लिखों की ज़ुबान पर है ताले,
और गुंडे- हत्यारे हमारे शासक हैं ।
बस उकसाव की एक चिंगारी की है देर,
और सारी क़ौमी एकता हो जाती है खत्म,
फिर भी भारतीयता की डोर से जुड़े हैं हम सभी,
देखो कितने सहनशील हैं हम ।

Deepak Hariramani

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