जब मेरे जन्म पर मुझे लक्ष्मी कहते हो, मैं समझती हूँ।
और कहीं मेरे जन्म से पहले मुझे मार देते हो फिर भी मैं समझती हूँ।।

हर कदम पर मुझपर ज़िम्मेदारियां डालते हो, मैं समझती हूँ।
बचपन से ही पराया धन समझते हो, मैं समझती हूँ।।

मुझे अपने भाईयों से अलग मानते हो, मैं समझती हूँ।
उनके हाथ में कलम मेरे हाथ में कलछी पकड़ाते हो, मैं समझती हूँ।।

दोस्तों के साथ घर पर बैठने को संस्कारी बुलाते हो, मैं समझती हूँ।
लेकिन उन्ही दोस्तों के साथ बाहर घूमने को चरित्रहीन बुलाते हो, मैं समझती हूँ।।

मैं अगर कुछ ना बोलूं तो कायर बुलाते हो, मैं समझती हूँ।
पर अगर मैं अपनी आवाज़ उठाऊँ तो हीन भाव से देखते हो, मैं समझती हूँ।।

राह पर जब लोग मुझपर नज़र डाले तब मौन रहते हो, मैं समझती हूँ।
पर मैं जब अपनी नज़र उठाऊँ तो उपहास करते हो, मैं समझती हूँ।।

विधवा होने पर मुझसे सहानुभूति रखते हो, मैं समझती हूँ।
पर किसी उत्सव में मेरी मौजूदगी को कलंक मानते हो, मैं समझती हूँ।।

अनेक अन्याय करो हर बार मैं समझती हूँ।
मैं एक नारी हूँ, मैं ही समझती हूँ, मैं ही समझती हूँ।।

Shreya Sinha

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