आँखों में तुम्हारी
एक अजब-सा नशा है,
फिर मदहोश कर जाने से,
क्यों डरती हो तुम?

पूरी कायनात की खूबसूरती है
तुम्हारी एक मुस्कान में,
फिर ये दुनिया सजाने से,
क्यों डरती हो तुम?

एक अलग ही नज़ाकत है
तुम्हारी हर अदा में,
फिर जलवे दिखाने से,
क्यों डरती हो तुम?

बातों में तुम्हारी,
एक अजब-सी मिठास है,
फिर किस्से सुनाने से,
क्यों डरती हो तुम?

क्यों डरती हो तुम?
नज़रें मिलाने से
क्यों डरती हो तुम?
यूँ ही मुस्कुराने से

क्यों डरती हो तुम?
शिद्दत बन जाने से
क्यों डरती हो तुम?
ख्वाबों में खो जाने से

ज़िंदगी बहुत कठिन भी नहीं है,
कुछ पल बेफिक्री के जी कर तो देखो!

Rituraj

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