समय का घर खुला पड़ा था आज,
बारजे पर खड़ा कोई झाँक नहीं रहा था,
ठण्ड, लगता है, कम गिरी थी दिल्ली में,
समय शायद, घर के बाहर निकला था आज|

समय के पुराने दोस्तों से पता लगाया,
दूरी बोली समय अपने दर्पण की तलाश में है,
गति ने कहा समय अपनी गहराई को मापने गया है,
अफ़सोस, किसी ने सही-सही जवाब नहीं दिया आज|

दूरी बगल आ कर खड़ी हो गयी थी,
गति भी घबरा रही थी आज,
समय को लेकर दोनों परेशान थे बहुत दिनों से,
शायद समय ने उन्हें बताया था कि मैं आने वाला हूँ|

यूँही बात करते-करते आंधी उठी आँगन में अचानक से,
आवाज़ पिछले दरवाज़े से भाग कर अन्दर आ गयी
चीखने लगी – मैंने समय को देखा किसी के साथ
पलटा, तो “धरा” चली आ रही थी समय के साथ|

Manish Pandey

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