महफूज़ थी इन बाहों में, क्यों दूर चले जाते हैं,

हाथों की लकीरों को देख, क्यों आंसू चले आते हैं,

याद आती है तेरी और हम सहम से जाते हैं,

पता नहीं क्या अदा थी और अब क्या हो गया,

एक ख्वाहिश ने उम्र भर का मुसाफिर बना दिया ।

नज़रों ने कहा बहुत कुछ, फिर भी अंजान बने जाते हैं,

अंधियारी रातों में उन, यादों के कातिब बने जाते हैं,

पर अल्फाज़ों की खोज में हम मीलों चले आते हैं,

उस नाम के पीछे इस गुमनाम को बदनाम बना दिया,

एक ख्वाहिश ने उम्र भर का मुसाफिर बना दिया ।

उसकी तस्वीर को देखकर हम दिवाने बने जाते हैं,

परवाह आज भी करते हैं और परवाने बने जाते हैं,

उसकी आबरू से हम क्यों प्यार किए जाते हैं,

अरे ! मिज़ाज़-ए-इश्क़ में इस रूह को क्यों जला दिया,

एक ख्वाहिश ने उम्र भर का मुसाफिर बना दिया।

शामें कटती नहीं और साल गुज़र जाते हैं,

तुम्हे पाने कि तमन्ना नहीं, पर मुहब्बत आज भी किए जाते हैं,

बातों में इबादत नहीं, पर रोज़ दिए जलाते हैं,

तब तज़ुर्बे ने तमन्नाओं को ख्वाहिश बना दिया,

और उस ख्वाहिश ने उम्र भर का मुसाफिर बना दिया ।

Sourav Chopra

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