आज उड़ते देखा एक पक्षी को मैंने,

उड़कर आया वो मेरे पास,

विस्मय में मैं डूब गया,

जब उसने मुझसे मेरी भाषा में बोला

“सुन इंसान, मेरी व्यथा समझ,

मुझको ना आती है ये बात रास

इतने जीव इस पृथ्वी पर,

पर उन सब में तू ही ख़ास

पर्यावरण को परिवर्तित करके,  तू पता है ऐशों आराम,

मेरा जीवन दरिद्रा होता,  और तेरा आलीशान ?

इन्ही समस्याओं में बहकर,

मैं हो जाऊँगा ईश्वर को प्यारा,

इंसान ही बनूंगा मैं,

यदि ज़िंदगी मिली दोबारा.

तब मैने उस पक्षी को,  एक अनमोल सत्य बतलाया,

“मेरी बात समझले साथी,

दूर से हमारा जीवन,

तुझे हुआ है अनमोल प्रतीत,

पर इंसान बनने की ग़लती मत करना,

झेल ना पाएगा तू इस वंश की कटु प्रीत.

तेरे पास तेरे इंद्रधनुष से रंग है,

हमारा जीवन तो हमने खुद बेस्वाद बनाया है,

हम ग़लतियाँ करते गये, करते गये,

और जैसा बोया वैसा पाया है.

तू उड़ सकता है,  और उड़ने को स्वतंत्र हैं,

हमारी तो सोच पर भी प्रतिबंध है.

तू रोज़ सुबह पूरे दिल से गाता है,

अपने गीत पूरे जगत को सुनाता है,

हमारे राग अब कहाँ बाहर आते हैं,

अंदर ही अंदर सिमट कर रह जाते हैं,

अल्फ़ाज़ भी ना बन पाते हैं.

तू जब उड़ान भरता साथ हमसफ़र होते हैं

चाहते हैं तुझे प्रेम जीवन में घोल देते हैं

हमारे तो अपने भी छोड़ जाते है

पता नही किस जन्नत की तलाश में आगे बढ़ जाते हैं.

इसलिए तू समझ जा मेरी बात का सार

इस कायनात से जुड़ी है कयामत की तार.

निकाल दे तू मन से ये विचार.”

 

Shivam Kumar

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