मैं! आसमान छूना चाहती थी

तेरे हर सपने को, पूरा करना चाहती थी

वो घर जो समुन्दर के पास देखा था,

तुझे तोहफ़े में देना चाहती थी

सोचा था इतना नाम करूँगी

तुझे बेटे की कमी न खलेगी

जब जब तू मुझे देखेगी

गर्व और ख़ुशी से हँस पड़ेगी

मैं जानती हूँ माँ, तेरा हर सपना तोड़ रही हूँ

इस ख़त को मेरी ख़ुदगर्ज़ी समझ लेना

मैं जानती हूँ माँ, तू रो रही है

पर अपनी बेटी को मजबूर समझ लेना

सपनों की उस राह पर

जहाँ मंज़िल बाँहें खोल खड़ी थी

इरादों को अपने पक्का कर

मैं उसकी ओर चल पड़ी थी

अनजान इस दुनिया के काले चेहरे से

मैं अपनी मंज़िल के पास ही खड़ी थी

पर उस काले चेहरे ने मेरा रास्ता रोका

मेरे दामन को मैला कर, मुझे हर तरह से तोड़ा

मैं चीख़ी, माँ और चिल्लाई भी

पर उस राक्षस को किसी ने न रोका

आत्मा टूट चुकी थी मेरी

हिम्मत पर न हारी मैं

इंसाफ़ की उम्मीद लगाए

आँसू पोंछ के आई मैं

लेकिन मैं टूट गयी माँ

इंसाफ़ की इस जंग में

चीर हरण हुआ मेरे आत्म विश्वास का

दैत्य थे ये सब हर रंग में

पैसे की ताक़त ने सच को मार दिया

बार-बार, हर-बार मेरी इज़्ज़त को नीलाम किया

तेरा साथ था माँ, पर मैं हार गयी

उस राक्षस की हँसी ने फिर से मेरा बलात्कार किया

बिखरी हुई मैं, फिर न उठ पाऊँगी

इस दाग़ का बोझ मैं, अब और न सह पाऊँगी

मैं जानती हूँ माँ, तू मुझसे ख़फ़ा है

इस ख़त को मेरा माफ़ीनामा समझ लेना

मैं जानती हूँ माँ, तू रो रही है

पर अपने बेटी को मजबूर समझ लेना

तान्या साहू

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